श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 38: युधिष्ठिरका शिशुपालको समझाना और भीष्मजीका उसके आक्षेपोंका उत्तर देना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.38.25 
बुद्धिर्मनो महद् वायुस्तेजोऽम्भ: खं मही च या।
चतुर्विधं च यद् भूतं सर्वं कृष्णे प्रतिष्ठितम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
महत्तत्त्व, अहंकार, मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी तथा भ्रूण, अण्ड, स्वेदज और उद्भिज्ज - ये चार प्रकार के जीव भगवान श्रीकृष्ण में ही स्थित हैं ॥25॥
 
Mahatattva, ego, eleven senses including mind, sky, air, light, water, earth and embryo, egg, swedaj and udbhijja - these four types of creatures are established in Lord Krishna only. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)