| श्री महाभारत » पर्व 2: सभा पर्व » अध्याय 37: शिशुपालके आक्षेपपूर्ण वचन » श्लोक 4 |
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| | | | श्लोक 2.37.4  | त्वादृशो धर्मयुक्तो हि कुर्वाण: प्रियकाम्यया।
भवत्यभ्यधिकं भीष्म लोकेष्ववमत: सताम्॥ ४॥ | | | | | | अनुवाद | | हे भीष्म! जब आप जैसा पुण्यात्मा पुरुष मनमाना आचरण करने लगता है अथवा किसी को प्रसन्न करने के लिए आचरण करने लगता है, तब वह मुनियों की सभा में महान् अनादर का पात्र बन जाता है।॥4॥ | | | | O Bhishma, when a virtuous man like you starts acting arbitrarily or to please someone, he becomes an object of great disrespect in the society of saints. ॥ 4॥ | | ✨ ai-generated | | |
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