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mahabharat 2.37.18: भरत! अथवा यदि ये मधुसूदन ही तुम्हारे पूज्य देवता हैं और इसीलिए तुम्हें उनकी पूजा करनी है, तो फिर इन राजाओं को अपमानित करने के लिए बुलाने की क्या आवश्यकता थी?॥18॥   |   mahabharat अध्याय 2.37: शिशुपालके आक्षेपपूर्ण वचन   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 37: शिशुपालके आक्षेपपूर्ण वचन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.37.18 
अथ वाभ्यर्चनीयोऽयं युष्माकं मधुसूदन:।
किं राजभिरिहानीतैरवमानाय भारत॥ १८॥
 
 
अनुवाद
भरत! अथवा यदि ये मधुसूदन ही तुम्हारे पूज्य देवता हैं और इसीलिए तुम्हें उनकी पूजा करनी है, तो फिर इन राजाओं को अपमानित करने के लिए बुलाने की क्या आवश्यकता थी?॥18॥
 
Bharata! Or if this Madhusudan is the god you worship and therefore you have to worship him, then what was the need to call these kings just to insult them?॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)