श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 36: राजसूययज्ञमें ब्राह्मणों तथा राजाओंका समागम, श्रीनारदजीके द्वारा श्रीकृष्ण-महिमाका वर्णन और भीष्मजीकी अनुमतिसे श्रीकृष्णकी अग्रपूजा  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  2.36.28-29 
भीष्म उवाच
एष ह्येषां समस्तानां तेजोबलपराक्रमै:।
मध्ये तपन्निवाभाति ज्योतिषामिव भास्कर:॥ २८॥
असूर्यमिव सूर्येण निर्वातमिव वायुना।
भासितं ह्लादितं चैव कृष्णेनेदं सदो हि न:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
भीष्म बोले - कुन्तीपुत्र! भगवान श्रीकृष्ण अपने तेज, बल और पराक्रम से इन समस्त राजाओं के बीच में उसी प्रकार प्रकाशित हो रहे हैं, जैसे जगत् की सूर्य-किरण सूर्य, नक्षत्रों और ग्रहों के बीच में चमकते हैं। जैसे उदित होते सूर्य के प्रकाश से अन्धकारमय स्थान प्रकाशित हो जाता है और वायु के संचार से वायुहीन स्थान सजीव हो जाता है, उसी प्रकार हमारी यह सभा भगवान श्रीकृष्ण से प्रसन्न और प्रकाशित हो रही है (अतः वे ही प्रथम पूजनीय हैं)॥28-29॥
 
Bhishma said - Son of Kunti! Lord Krishna is shining among all these kings with his brilliance, strength and valour, just like the Sun, the sun-ray of the world, shines among the stars and planets. Just as a dark place becomes illuminated with the light of the rising sun and an airless place becomes alive with the circulation of air, in the same way our assembly is being delighted and illuminated by Lord Krishna (hence he is worthy of being worshipped first).॥28-29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)