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mahabharat 2.36.13: हे कुरुपुत्र! यह जानकर कि राजाओं के इस समूह के रूप में वास्तव में देवताओं का समूह है, नारदजी ने मन में कमलनेत्र भगवान श्रीहरि का चिंतन किया ॥13॥   |   mahabharat अध्याय 2.36: राजसूययज्ञमें ब्राह्मणों तथा राजाओंका समागम, श्रीनारदजीके द्वारा श्रीकृष्ण-महिमाका वर्णन और भीष्मजीकी अनुमतिसे श्रीकृष्णकी अग्रपूजा   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.36.13 
देवानां संगमं तं तु विज्ञाय कुरुनन्दन।
नारद: पुण्डरीकाक्षं सस्मार मनसा हरिम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुपुत्र! यह जानकर कि राजाओं के इस समूह के रूप में वास्तव में देवताओं का समूह है, नारदजी ने मन में कमलनेत्र भगवान श्रीहरि का चिंतन किया ॥13॥
 
O son of Kuru! On realizing that in the form of this group of kings there was actually a gathering of gods, Narada contemplated in his mind the lotus-eyed Lord Shri Hari. ॥13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)