श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 35: राजसूययज्ञका वर्णन  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  2.35.1-2 
वैशम्पायन उवाच
पितामहं गुरुं चैव प्रत्युद्‍गम्य युधिष्ठिर:।
अभिवाद्य ततो राजन्निदं वचनमब्रवीत्॥ १॥
भीष्मं द्रोणं कृपं द्रौणिं दुर्योधनविविंशती।
अस्मिन् यज्ञे भवन्तो मामनुगृह्णन्तु सर्वश:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! पितामह भीष्म तथा गुरु द्रोणाचार्य आदि का स्वागत करके युधिष्ठिर ने उनके चरणों में प्रणाम किया और भीष्म, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा, दुर्योधन तथा विविंशति से कहा - 'इस यज्ञ में आप सब प्रकार से मेरी कृपा करें।' 1-2॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! After welcoming grandfather Bhishma and Guru Dronacharya etc., Yudhishthira bowed at their feet and said to Bhishma, Drona, Kripa, Ashwatthama, Duryodhana and Vivinshati - 'Please bless me in every way in this yagya.' 1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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