वहाँ विश्राम करके पृथ्वी के स्वामी भगवान् ने धर्मराज युधिष्ठिर से भेंट की, जो बहुत-सी दक्षिणा दे रहे थे और बहुत-से अतिथियों से घिरे हुए थे। जनमेजय! उस समय राजाओं, ब्राह्मणों और ऋषियों से परिपूर्ण वह यज्ञ-वेदी देवताओं से भरे हुए स्वर्ग के समान शोभायमान हो रही थी।
After resting there, the lord of the earth met Dharmaraja Yudhishthira who was offering a lot of dakshina and was surrounded by many guests. Janamejaya! At that time, that sacrificial altar filled with kings, Brahmins and sages looked as beautiful as a heaven filled with gods. 24-25.
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयपर्वणि निमन्त्रितराजागमने चतुस्त्रिंशोऽध्याय:॥ ३४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयपर्वमें निमन्त्रित राजाओंका आगमनविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)