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mahabharat 2.33.d4-d5h: उनके इस आचरण के कारण सारा संसार उनसे उसी प्रकार प्रेम करने लगा, जैसे एक पुत्र अपने पिता से करता है। राजा युधिष्ठिर से द्वेष रखने वाला कोई नहीं था, इसीलिए वे 'अजातशत्रु' कहलाए।   |   mahabharat अध्याय 2.33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक d4-d5h
 
 
श्लोक  2.33.d4-d5h 
एवंवृत्ते जगत् तस्मिन् पितरीवान्वरज्यत॥
न तस्य विद्यते द्वेष्टा ततोऽस्याजातशत्रुता।)
 
 
अनुवाद
उनके इस आचरण के कारण सारा संसार उनसे उसी प्रकार प्रेम करने लगा, जैसे एक पुत्र अपने पिता से करता है। राजा युधिष्ठिर से द्वेष रखने वाला कोई नहीं था, इसीलिए वे 'अजातशत्रु' कहलाए।
 
Due to his such behaviour, the whole world started loving him like a son loves his father. There was no one who hated King Yudhishthira, that is why he was called 'Ajatashatru'.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)