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mahabharat 2.33.d3: युधिष्ठिर ने किसी का विरोध नहीं किया और सबके कल्याण में लगे रहे। 'सब संतुष्ट और प्रसन्न हों, कोष खुला हो और सबको उदारतापूर्वक दान दिया जाए, किसी पर बल प्रयोग न किया जाए, धर्म! तुम धन्य हो।' ऐसी बातों के अतिरिक्त युधिष्ठिर के मुख से और कुछ न निकला।   |   mahabharat अध्याय 2.33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक d3
 
 
श्लोक  2.33.d3 
अविरोधेन सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिर:।
प्रीयतां दीयतां सर्वं मुक्त्वा कोषं बलं विना॥
साधु धर्मेति पार्थस्य नान्यच्छ्रूयेत भाषितम्।
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने किसी का विरोध नहीं किया और सबके कल्याण में लगे रहे। 'सब संतुष्ट और प्रसन्न हों, कोष खुला हो और सबको उदारतापूर्वक दान दिया जाए, किसी पर बल प्रयोग न किया जाए, धर्म! तुम धन्य हो।' ऐसी बातों के अतिरिक्त युधिष्ठिर के मुख से और कुछ न निकला।
 
Yudhishthira did not oppose anyone and remained engaged in the welfare of all. Apart from saying things like 'Everyone should be satisfied and pleased, the treasury should be opened and donations should be given to everyone generously, force should not be used on anyone, Dharma! You are blessed.' Nothing else could be heard from Yudhishthira's mouth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)