श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.33.9 
सुहृदश्चैव ये सर्वे पृथक् च सह चाब्रुवन्।
यज्ञकालस्तव विभो क्रियतामत्र साम्प्रतम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
उनके सभी शुभचिंतक मित्र एक साथ इस प्रकार कहने लगे - ‘प्रभु! आपके लिए यज्ञ करने का यही उचित समय है; अतः अब इसे आरम्भ कीजिए।’॥9॥
 
All his well wishing friends started saying this severally and together - 'Prabhu! This is the right time for you to perform the yagya; therefore, commence it now.'॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)