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mahabharat 2.33.7: धर्म की कमाई से उसकी इतनी अधिक सम्पत्ति हो गई थी कि सैकड़ों वर्षों तक उदारतापूर्वक दान करने पर भी वह समाप्त नहीं हो सकती थी ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 2.33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.33.7 
धर्म्यैर्धनागमैस्तस्य ववृधे निचयो महान्।
कर्तुं यस्य न शक्येत क्षयो वर्षशतैरपि॥ ७॥
 
 
अनुवाद
धर्म की कमाई से उसकी इतनी अधिक सम्पत्ति हो गई थी कि सैकड़ों वर्षों तक उदारतापूर्वक दान करने पर भी वह समाप्त नहीं हो सकती थी ॥7॥
 
His enormous wealth had grown so much from the income of righteous earnings that it could not be exhausted even if he gave away lavishly for hundreds of years. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)