श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  2.33.45-46h 
भ्रातृभिर्ज्ञातिभिश्चैव सुहृद्भि: सचिवै: सह।
क्षत्रियैश्च मनुष्येन्द्रैर्नानादेशसमागतै:॥ ४५॥
अमात्यैश्च नरश्रेष्ठो धर्मो विग्रहवानिव।
 
 
अनुवाद
उस समय उनके अपने भाई, जाति-बन्धु, मित्र, अनेक देशों के क्षत्रिय राजा और मंत्रीगण उनके सहायक थे। मनुष्यश्रेष्ठ युधिष्ठिर धर्म की मूर्ति जान पड़ते थे। 45 1/2॥
 
At that time, he had his own brothers, caste relatives, friends, Kshatriya kings and ministers from many countries as his assistants. Yudhishthira, the best human being, seemed to be an idol of religion. 45 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)