श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.33.43 
ततस्ते तु यथाकालं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम्।
दीक्षयाञ्चक्रिरे विप्रा राजसूयाय भारत॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
भारत! तत्पश्चात् वहाँ उपस्थित सभी ब्राह्मणों ने उचित समय पर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ में दीक्षित किया।
 
Bharat! Thereafter all the Brahmins present there initiated Yudhishthira, son of Kunti, into the Rajasuya Yagya at the right time.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)