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mahabharat 2.33.4: हे राजन! दूसरों की तो बात ही छोड़िए, वहाँ चोरों, ठगों, राजा या राजा के विश्वासपात्रों के मुँह से भी झूठ नहीं सुना जाता था। प्रजा से ही नहीं, आपस में भी वे झूठ नहीं बोलते थे, छल नहीं करते थे।   |   mahabharat अध्याय 2.33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.33.4 
दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यो वा राजन् प्रति परस्परम्।
राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयन्त मृषा गिर:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! दूसरों की तो बात ही छोड़िए, वहाँ चोरों, ठगों, राजा या राजा के विश्वासपात्रों के मुँह से भी झूठ नहीं सुना जाता था। प्रजा से ही नहीं, आपस में भी वे झूठ नहीं बोलते थे, छल नहीं करते थे।
 
O King! Forget about others, no lies were heard there even from the mouths of thieves, thugs, the king or the king's trusted people. Not only with the subjects, they did not lie or cheat even among themselves.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)