श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  2.33.36 
एतेषां पुत्रवर्गाश्च शिष्याश्च भरतर्षभ।
बभूवुर्होत्रगा: सर्वे वेदवेदाङ्गपारगा:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! उनके पुत्र और शिष्य, जो सम्पूर्ण वेदों के पारंगत विद्वान थे, 'होत्राग' (सप्तहोता) हुए॥36॥
 
Bharatshrestha! His sons and disciples, who were expert scholars of all the Vedas, became 'Hotrag' (Saptahota). 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)