श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.33.30 
इन्द्रसेनो विशोकश्च पूरुश्चार्जुनसारथि:।
अन्नाद्याहरणे युक्ता: सन्तु मत्प्रियकाम्यया॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
इन्द्रसेन, विशोक और अर्जुन के सारथि पुरु, मुझसे प्रेम करने की इच्छा से अन्न आदि संग्रह करने में लग जाएँ॥30॥
 
‘Puru, the charioteer of Indrasen, Vishoka and Arjun, let them get busy in collecting food etc. with the desire of loving me. 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)