श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.33.22 
मां वाप्यभ्यनुजानीहि सहैभिरनुजैर्विभो।
अनुज्ञातस्त्वया कृष्ण प्राप्नुयां क्रतुमुत्तमम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! अथवा मुझे अपने इन छोटे भाइयों सहित दीक्षा लेने की अनुमति दीजिए। श्री कृष्ण! आपकी अनुमति प्राप्त होने पर ही मैं उस महान यज्ञ में दीक्षा लूँगा। 22।
 
Lord! Or give me permission to take initiation along with these younger brothers of mine. Shri Krishna! Only after getting your permission will I take initiation in that great yagya. 22.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)