श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.33.21 
तद् दीक्षापय गोविन्द त्वमात्मानं महाभुज।
त्वयीष्टवति दाशार्ह विपाप्मा भविता ह्यहम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
हे विशाल भुजाओं वाले गोविन्द! आप स्वयं यज्ञ की दीक्षा लें। दशरथ! यदि आप यज्ञ करेंगे तो मैं पापों से मुक्त हो जाऊँगा।
 
O Govinda with huge arms! You yourself should take initiation in performing Yagya. Dasharha! If you perform Yagya, I will become free from sins.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)