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mahabharat 2.33.16-17: नरश्रेष्ठ जनमेजय! राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और उनसे मिले। उनका विधिपूर्वक स्वागत करके उनका कुशलक्षेम पूछा और जब वे सुखपूर्वक बैठ गए, तब चारों भाइयों धौम्य, द्वैपायन, ऋत्विजों तथा भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव के साथ युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण के पास जाकर उनसे कहा॥16-17॥   |   mahabharat अध्याय 2.33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  2.33.16-17 
तं मुदाभिसमागम्य सत्कृत्य च यथाविधि।
स पृष्ट्वा कुशलं चैव सुखासीनं युधिष्ठिर:॥ १६॥
धौम्यद्वैपायनमुखैर्ऋत्विग्भि: पुरुषर्षभ।
भीमार्जुनयमैश्चैव सहित: कृष्णमब्रवीत्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
नरश्रेष्ठ जनमेजय! राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और उनसे मिले। उनका विधिपूर्वक स्वागत करके उनका कुशलक्षेम पूछा और जब वे सुखपूर्वक बैठ गए, तब चारों भाइयों धौम्य, द्वैपायन, ऋत्विजों तथा भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव के साथ युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण के पास जाकर उनसे कहा॥16-17॥
 
Narashreshtha Janamejaya! King Yudhishthir was very happy and met him. After formally welcoming them, they asked for their well-being and when they sat down comfortably, then Yudhishthira, along with the four brothers Dhaumya, Dvaipayana, Ritvijas and Bhima, Arjun, Nakul and Sahadev, went near and said to Shri Krishna. 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)