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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 33: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.33.15 
पूर्णमापूरयंस्तेषां द्विषच्छोकावहोऽभवत्।
असूर्यमिव सूर्येण निवातमिव वायुना।
कृष्णेन समुपेतेन जहृषे भारतं पुरम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
पाण्डवों का कोष तो पहले से ही भरा हुआ था, परन्तु भगवान ने (उन्हें अक्षय धन देकर) उसे और भी अधिक भर दिया। उनके आगमन से पाण्डवों के शत्रुओं का शोक बढ़ गया। जैसे सूर्य के बिना अन्धकारमय संसार, सूर्य के उदय होने पर प्रकाश से भर जाता है, जैसे वायुहीन स्थान वायु के प्रवाहित होने पर नवीन प्राणशक्ति से भर जाता है, उसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के आगमन पर सारा इन्द्रप्रस्थ हर्ष और प्रसन्नता से भर गया॥15॥
 
The Pandavas' treasury was already full, but God made it even fuller (by gifting them inexhaustible wealth). Their arrival increased the grief of the Pandavas' enemies. Just as the world, which is dark without the sun, is filled with light when the sun rises, just as a place without air is filled with new life force when air flows in it, similarly, the entire Indraprastha was filled with joy and happiness when Lord Krishna arrived.॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)