श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 31: सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय  »  श्लोक d97-d98h
 
 
श्लोक  2.31.d97-d98h 
प्रीतिमानभवद् दृष्ट्वा रत्नौघं तं च पाण्डव:।
तं परिष्वज्य पाणिभ्यां दृष्ट्वा तान् प्रीतिमानभूत्॥
विसृज्य द्रमिलान् सर्वान् गमनायोपचक्रमे।)
 
 
अनुवाद
पांडुकुमार सहदेव रत्नों के उस ढेर को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने घटोत्कच को दोनों हाथों से गले लगाया और अन्य राक्षसों की ओर देखकर भी अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। इसके बाद सहदेव ने सभी द्रविड़ सैनिकों को विदा किया और वहाँ से लौटने की तैयारी करने लगे।
 
Pandukumar Sahadev was very happy to see that pile of gems. He hugged Ghatotkacha with both his hands and expressed his happiness looking at the other demons too. After this, Sahadev bid farewell to all the Dravid soldiers and started preparing to return from there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)