श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 31: सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय  »  श्लोक d56-d57
 
 
श्लोक  2.31.d56-d57 
अजातशत्रुर्धर्मात्मा धर्मो विग्रहवानिव॥
ततो युधिष्ठिरो राजा प्राप्य राज्यमकारयत्।
गङ्गाया दक्षिणे तीरे नगरे नागसाह्वये॥
 
 
अनुवाद
उनका किसी से कोई बैर नहीं है, इसीलिए लोग उन्हें अजातशत्रु कहते हैं। उनका मन सदैव धर्म में लगा रहता है। वे धर्म के साक्षात स्वरूप प्रतीत होते हैं। गंगा के दक्षिणी तट पर हस्तिनापुर नाम का एक नगर है। राजा युधिष्ठिर ने वहीं अपना पैतृक राज्य प्राप्त किया और उसकी रक्षा की।
 
He has no enmity towards anyone; that is why people call him Ajatashatru. His mind is always focused on Dharma. He seems to be the embodiment of Dharma. There is a city named Hastinapur on the southern bank of the Ganges. King Yudhishthira got his ancestral kingdom there and protected it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)