vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 2: सभा पर्व
»
अध्याय 31: सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय
»
श्लोक d45
श्लोक
2.31.d45
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धोक्षितं शुभम्।
विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम्॥
अनुवाद
वे दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण किए हुए तथा दिव्य सुगंध से अभिमंत्रित अत्यंत सुंदर लग रहे थे। उनका शरीर सूर्य और अग्नि के समान चमक रहा था।
He looked very beautiful, wearing a divine garland and divine clothes and anointed with divine fragrance. His body glowed like the sun and fire.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×