हे भरतपुत्र जनमेजय! उस स्वर्ण-राशि में एक हजार करोड़ से भी अधिक रत्न थे। उसमें विचित्र रत्न और बहुमूल्य रत्न भी थे। गाय, भैंस, भेड़ और बकरियों की संख्या भी बहुत थी। हे राजन! इन सबको महामना धर्मराज की सेवा में समर्पित करके सहदेव राजधानी में सुखपूर्वक रहने लगे। 78।
O great Bharata, Janamejaya! That amount of gold contained more than a thousand crores. There were strange gems and precious stones. The number of cows, buffaloes, sheep and goats was also large. O King! Having dedicated all these to the service of the great Dharmaraja, Sahadeva started living happily in the capital. 78.
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि सहदेवदक्षिणदिग्विजये एकत्रिंशोऽध्याय:॥ ३१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०० श्लोक मिलाकर कुल १७८ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)