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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 31: सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.31.57 
तत उत्थाय हृष्टात्मा प्राञ्जलि: शिरसा नत:।
पूजयामास माद्रेय: पावकं भरतर्षभ॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर माद्रीपुत्र सहदेव अत्यंत प्रसन्न हुए और वहाँ से उठकर हाथ जोड़कर तथा सिर झुकाकर अग्निदेव की आराधना करने लगे।
 
On hearing this, the son of Madri, Sahadeva, became very happy and got up from there. With folded hands and bowed head, he worshipped the god Agni.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)