vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 2: सभा पर्व
»
अध्याय 31: सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय
»
श्लोक 57
श्लोक
2.31.57
तत उत्थाय हृष्टात्मा प्राञ्जलि: शिरसा नत:।
पूजयामास माद्रेय: पावकं भरतर्षभ॥ ५७॥
अनुवाद
यह सुनकर माद्रीपुत्र सहदेव अत्यंत प्रसन्न हुए और वहाँ से उठकर हाथ जोड़कर तथा सिर झुकाकर अग्निदेव की आराधना करने लगे।
On hearing this, the son of Madri, Sahadeva, became very happy and got up from there. With folded hands and bowed head, he worshipped the god Agni.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×