श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 31: सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  2.31.50 
वैशम्पायन उवाच
इत्येवं मन्त्रमाग्नेयं पठन् यो जुहुयाद् विभुम्।
ऋद्धिमान् सततं दान्त: सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जो द्विज इन श्लोकरूपी आग्नेय मन्त्रों को पढ़कर (अन्त में 'स्वाहा' कहकर) भगवान अग्निदेव को आहुति देता है, वह सदा समृद्ध और जितेन्द्रिय हो जाता है और सब पापों से मुक्त हो जाता है ॥50॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! The Dwija who, while reciting these Shloka-form Agneya Mantras (saying 'Swaha' at the end) offers the oblation to Lord Agnidev, he becomes always prosperous and Jitendriya and becomes free from all sins. 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)