श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 31: सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.31.47 
ऋषिभिर्ब्राह्मणैश्चैव दैवतैरसुरैरपि।
नित्यं सुहुत यज्ञेषु सत्येन विपुनीहि माम्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
ऋषि, ब्राह्मण, देवता और दानव भी यज्ञ करते समय सदैव आपको ही आहुति देते हैं। कृपया अपने सत्य के बल से मुझे पवित्र करें ॥47॥
 
Rishis, Brahmins, Gods and even Demons always offer sacrifices to you while performing sacrifices. Please purify me by the power of your truth. ॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)