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श्लोक 2.3.5  |
मन:प्रह्लादिनीं चित्रां सर्वरत्नविभूषिताम्।
अस्ति बिन्दुसरस्युग्रा गदा च कुरुनन्दन॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| 'जो सब प्रकार के रत्नों से विभूषित होगा, विचित्र होगा और मन को आनन्द देने वाला होगा। कुरुनन्दन! बिन्दुसार के पास भयंकर गदा भी है। 5॥ |
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| 'Which will be adorned with all types of gems, strange and will give joy to the mind. Kurunandan! Bindusara also has a fierce mace. 5॥ |
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