श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 3: मयासुरका भीमसेन और अर्जुनको गदा और शंख लाकर देना तथा उसके द्वारा अद्‍भुत सभाका निर्माण  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.3.35 
काननानि सुगन्धीनि पुष्करिण्यश्च सर्वश:।
हंसकारण्डवोपेताश्चक्रवाकोपशोभिता:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
केवल वृक्ष ही नहीं, भवन के चारों ओर अनेक सुगंधित वन, उद्यान और बावड़ियाँ थीं, जो हंस, करण्डव और चक्रवाक आदि पक्षियों से भरी होने के कारण बहुत सुन्दर लग रही थीं।
 
Not only trees, all around the building there were many fragrant forests, gardens and stepwells, which were looking very beautiful as they were filled with birds like swans, Karandava and Chakravaka. 35.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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