श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 3: मयासुरका भीमसेन और अर्जुनको गदा और शंख लाकर देना तथा उसके द्वारा अद्‍भुत सभाका निर्माण  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.3.31 
पद्मसौगन्धिकवतीं नानाद्विजगणायुताम्।
पुष्पितै: पङ्कजैश्चित्रां कूर्मैर्मत्स्यैश्च काञ्चनै:।
चित्रस्फटिकसोपानां निष्पङ्कसलिलां शुभाम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
पद्मरागम से जड़े कमलों की मनमोहक सुगंध उसमें फैल रही थी। उसमें अनेक प्रकार के पक्षी रहते थे। खिले हुए कमल, सुनहरी मछलियाँ और कछुए उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस तालाब में उतरने के लिए स्फटिक की विचित्र सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। वह कीचड़ रहित स्वच्छ जल से भरा हुआ था। देखने में वह अत्यंत सुंदर था। 31
 
The beautiful fragrance of the lotuses studded with Padmaragam was spreading in it. Many kinds of birds lived in it. The blooming lotuses, golden fishes and turtles were adding to its beauty. To descend into that pond, strange stairs made of crystals were made. It was filled with clean water without mud. It was very beautiful to look at. 31.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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