श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 3: मयासुरका भीमसेन और अर्जुनको गदा और शंख लाकर देना तथा उसके द्वारा अद्‍भुत सभाका निर्माण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.3.25 
प्रबभौ ज्वलमानेव दिव्या दिव्येन वर्चसा।
नवमेघप्रतीकाशा दिवमावृत्य विष्ठिता।
आयता विपुला रम्या विपाप्मा विगतक्लमा॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वह दिव्य सभाभवन अपनी अलौकिक प्रभा से निरन्तर प्रकाशित हो रहा था। उसकी ऊँचाई इतनी अधिक थी कि वह आकाश को घेरे हुए नवीन मेघों के समान प्रतीत हो रहा था। उसका विस्तार भी विशाल था। वह सुन्दर सभाभवन पापों और कष्टों का नाश करने में समर्थ था॥ 25॥
 
That divine assembly hall appeared to be constantly lit up with its supernatural brilliance. Its height was so great that it stood like a cloud of new clouds, encircling the sky. Its expanse was also huge. That beautiful assembly hall was capable of destroying sins and sufferings.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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