श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 3: मयासुरका भीमसेन और अर्जुनको गदा और शंख लाकर देना तथा उसके द्वारा अद्‍भुत सभाका निर्माण  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.3.16 
यत्रेष्टं वासुदेवेन सत्रैर्वर्षगणान् बहून्।
श्रद्दधानेन सततं धर्मसम्प्रतिपत्तये॥ १६॥
 
 
अनुवाद
यह वही स्थान है जहाँ भगवान वासुदेव ने धार्मिक परम्परा की रक्षा के लिए निरंतर अनेक वर्षों तक भक्तिपूर्वक यज्ञ किया था॥16॥
 
This is the same place where Lord Vasudeva had performed yajna with devotion for many years continuously to protect the religious tradition.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)