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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 28: किम्पुरुष, हाटक तथा उत्तरकुरुपर विजय प्राप्त करके अर्जुनका इन्द्रप्रस्थ लौटना  »  श्लोक d55
 
 
श्लोक  2.28.d55 
दृष्ट्वा ते तु मुदा युक्ता: कौतूहलसमन्विता:॥
रत्नैर्विभूषणैश्चैव अभ्यवर्षन्त पाण्डवम्।
 
 
अनुवाद
वहाँ के सभी निवासी उसे बड़ी प्रसन्नता और कौतूहल से देखते थे और उस पर रत्न और आभूषणों की वर्षा करते थे।
 
All the residents there used to watch him with great joy and curiosity and shower gems and ornaments on him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)