|
| |
| |
श्लोक 2.28.9-10  |
पार्थ नेदं त्वया शक्यं पुरं जेतुं कथंचन।
उपावर्तस्व कल्याण पर्याप्तमिदमच्युत॥ ९॥
इदं पुरं य: प्रविशेद् ध्रुवं न स भवेन्नर:।
प्रीयामहे त्वया वीर पर्याप्तो विजयस्तव॥ १०॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| 'पार्थ! तुम इस नगरी को किसी भी प्रकार नहीं जीत सकते। हे शुभस्वरूप अर्जुन! यहाँ से लौट जाओ। अच्युत! तुम यहाँ तक आ गए, यही पर्याप्त है। जो मनुष्य इस नगरी में प्रवेश करता है, वह अवश्य ही मर जाता है। वीर! हम तुम पर अत्यंत प्रसन्न हैं। यहाँ पहुँच जाना ही तुम्हारी महान विजय है।॥ 9-10॥ |
| |
| ‘Parth! You cannot conquer this city in any way. Arjuna, the embodiment of auspiciousness! Return from here. Achyuta! You have come till here, this is enough. The person who enters this city surely dies. Brave! We are very pleased with you. Reaching here itself is your great victory.॥ 9-10॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|