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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 26: अर्जुनके द्वारा अनेक देशों, राजाओं तथा भगदत्तकी पराजय  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.26.1 
जनमेजय उवाच
दिशामभिजयं ब्रह्मन् विस्तरेणानुकीर्तय।
न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय बोले - हे ब्रह्मन! कृपया दिग्विजय का विस्तारपूर्वक वर्णन करें। मैं अपने पूर्वजों की इस महान कथा को सुनकर संतुष्ट नहीं हूँ।
 
Janamejaya said - O Brahman! Please describe Digvijaya in detail. I am not satisfied listening to this great story of my ancestors.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)