श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 26: अर्जुनके द्वारा अनेक देशों, राजाओं तथा भगदत्तकी पराजय  » 
 
 
अध्याय 26: अर्जुनके द्वारा अनेक देशों, राजाओं तथा भगदत्तकी पराजय
 
श्लोक 1:  जनमेजय बोले - हे ब्रह्मन! कृपया दिग्विजय का विस्तारपूर्वक वर्णन करें। मैं अपने पूर्वजों की इस महान कथा को सुनकर संतुष्ट नहीं हूँ।
 
श्लोक 2:  वैशम्पायन कहते हैं, 'हे राजन! यद्यपि कुन्ती के चारों पुत्रों ने एक ही समय में चारों दिशाओं से पृथ्वी पर विजय प्राप्त की थी, फिर भी मैं सबसे पहले आपको अर्जुन की विश्वविजय की कथा सुनाता हूँ।'
 
श्लोक 3:  महाबली धनंजय ने बिना कोई विशेष पराक्रम दिखाए ही सर्वप्रथम कुलिन्द देश के जमींदारों को अपने अधीन कर लिया ॥3॥
 
श्लोक 4:  कुलिन्दों के राजाओं के साथ-साथ कालकूट और आनर्त देशों के राजाओं को भी पराजित करके उसने राजा सुमण्डलु को भी उसकी सेना सहित परास्त कर दिया ॥4॥
 
श्लोक 5:  राजन! तत्पश्चात् शत्रुओं को संताप देने वाले ऋषि अर्जुन ने सुमण्डल को अपना साथी बनाया और उसके साथ जाकर शाकलद्वीप तथा राजा प्रतिविन्ध्य को जीत लिया॥5॥
 
श्लोक 6:  अर्जुन के सैनिकों और शाकलद्वीप तथा अन्य सात द्वीपों में रहने वाले राजाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
 
श्लोक 7:  हे जनमेजय, भरतवंशी रत्न, अर्जुन ने उन महान धनुर्धरों को भी परास्त कर दिया और उन्हें साथ लेकर प्राग्ज्योतिषपुर पर आक्रमण कर दिया।
 
श्लोक 8:  महाराज! प्राग्ज्योतिषपुर का प्रधान राजा भगदत्त था। महात्मा अर्जुन ने उनसे बहुत बड़ा युद्ध किया।
 
श्लोक 9:  प्राग्ज्योतिषपुर के राजा किरात के चारों ओर अनेक योद्धा थे जो चीन और सागर के द्वीपों में रहते थे।
 
श्लोक 10:  राजा भगदत्त ने अर्जुन के साथ आठ दिन तक युद्ध किया, किन्तु यह देखकर कि वह युद्ध से थक नहीं रहा है, उन्होंने हँसकर कहा- ॥10॥
 
श्लोक 11:  महाबाहु कौरवनन्दन! आप इन्द्र के पुत्र और युद्ध में तेजस्वी पराक्रमी योद्धा हैं। आपमें ऐसा बल और पराक्रम होना उचित ही है॥ 11॥
 
श्लोक 12:  मैं देवराज इन्द्र का मित्र हूँ और युद्ध में उनसे किसी भी प्रकार कम नहीं हूँ, पुत्र! फिर भी मैं युद्ध में तुम्हारे सामने टिक नहीं सकूँगा॥12॥
 
श्लोक 13:  'पाण्डु नन्दन! आपकी क्या इच्छा है, कहिए? आपका कौन-सा प्रिय कार्य मैं करूँ? पुत्र! महाबाहो! आप जो कहेंगे, मैं करूँगा।'॥13॥
 
श्लोक 14-15:  अर्जुन बोले, "महाराज! धर्म के ज्ञाता और सत्यवादी कुरुकुलपुत्र राजा युधिष्ठिर बहुत-सी दक्षिणा देकर राजसूय यज्ञ करने जा रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि वे विश्व के सम्राट बनें। आप उन्हें यह दान दें। आप मेरे पिता के मित्र हैं और मुझसे प्रेम भी करते हैं; इसलिए मैं आपको आदेश नहीं दे सकता। आप उन्हें प्रेमपूर्वक ही यह दान दें।" 14-15.
 
श्लोक 16:  भगदत्त बोले—कुन्तीकुमार! जैसे तुम मेरे लिए हो, वैसे ही राजा युधिष्ठिर भी मेरे लिए हैं। मैं यह सब करूँगा। कहो, मैं तुम्हारे लिए और क्या कर सकता हूँ?॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)