श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 25: अर्जुन आदि चारों भाइयोंकी दिग्विजयके लिये यात्रा  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.25.6 
स्वस्तिवाच्यार्हतो विप्रान् प्रयाहि भरतर्षभ।
दुर्हृदामप्रहर्षाय सुहृदां नन्दनाय च॥ ६॥
 
 
अनुवाद
'भरतकुलभूषण! आदरणीय ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर यात्रा करो। तुम्हारी यह यात्रा तुम्हारे शत्रुओं के दुःख और मित्रों के हर्ष को बढ़ाने वाली हो।'॥6॥
 
‘Bharatkulbhushan! Travel after reciting Swastiva from respected Brahmins. May this journey of yours increase the sorrow of your enemies and the joy of your friends. 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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