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mahabharat 2.24.d10-d11h: महाराज! उस समय जरासंध का शरीर शव बन चुका था और मांस का लोथड़ा सा लग रहा था। उसका मांस, हड्डियाँ, चर्बी और त्वचा सब सूख चुके थे। उसका मस्तिष्क और शरीर दो टुकड़ों में फट गया था।   |   mahabharat अध्याय 2.24: भीमके द्वारा जरासंधका वध, बंदी राजाओंकी मुक्ति, श्रीकृष्ण आदिका भेंट लेकर इन्द्रप्रस्थमें आना और वहाँसे श्रीकृष्णका द्वारका जाना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 24: भीमके द्वारा जरासंधका वध, बंदी राजाओंकी मुक्ति, श्रीकृष्ण आदिका भेंट लेकर इन्द्रप्रस्थमें आना और वहाँसे श्रीकृष्णका द्वारका जाना  »  श्लोक d10-d11h
 
 
श्लोक  2.24.d10-d11h 
शुष्कमांसास्थिमेदस्त्वग्भिन्नमस्तिष्कपिण्डक:॥
शवभूतस्तदा राजन् पिण्डीकृत इवाबभौ।)
 
 
अनुवाद
महाराज! उस समय जरासंध का शरीर शव बन चुका था और मांस का लोथड़ा सा लग रहा था। उसका मांस, हड्डियाँ, चर्बी और त्वचा सब सूख चुके थे। उसका मस्तिष्क और शरीर दो टुकड़ों में फट गया था।
 
King! At that time Jarasandha's body had become corpse and looked like a lump of flesh. His flesh, bones, fat and skin had all dried up. His brain and body were torn into two parts.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)