श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 24: भीमके द्वारा जरासंधका वध, बंदी राजाओंकी मुक्ति, श्रीकृष्ण आदिका भेंट लेकर इन्द्रप्रस्थमें आना और वहाँसे श्रीकृष्णका द्वारका जाना  » 
 
 
अध्याय 24: भीमके द्वारा जरासंधका वध, बंदी राजाओंकी मुक्ति, श्रीकृष्ण आदिका भेंट लेकर इन्द्रप्रस्थमें आना और वहाँसे श्रीकृष्णका द्वारका जाना
 
श्लोक 1:  वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात् भीमसेन ने अपनी विशाल बुद्धि के बल से जरासन्ध को मारने की इच्छा से यदुनन्दन श्रीकृष्ण को सम्बोधित करके कहा - ॥1॥
 
श्लोक 2:  हे यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण! जरासंध ने अपनी कमर को अपनी लंगोटी से कसकर बाँध लिया है। जब तक मैं जीवित हूँ, यह पापी मेरे वश में नहीं लगता।॥2॥
 
श्लोक 3:  उनके ऐसा कहने पर पुरूषोत्तम श्रीकृष्ण ने भीमसेन को जरासन्ध को मारने के लिये उकसाया और कहा-3॥
 
श्लोक 4:  भीम! आज तुम अपना श्रेष्ठ दिव्य रूप तथा वायुदेव से प्राप्त दिव्य शक्ति जरासंध पर शीघ्रतापूर्वक प्रकट करो।
 
श्लोक d1:  'यह मूर्ख योद्धा जरासंध केवल तुम्हारे ही हाथों मारा जा सकता है।' जब बलराम जरासंध को मारने का प्रयत्न कर रहे थे, तब मैंने आकाशवाणी सुनी थी।
 
श्लोक d2:  ‘इसीलिए भाई बलराम ने उन्हें गोमंत पर्वत पर जीवित छोड़ दिया; अन्यथा बलदेवजी के वश में आ जाने पर जरासंध के अतिरिक्त और कौन जीवित बच सकता था?
 
श्लोक d3:  'महान् भीम! आपके अतिरिक्त इसे कोई नहीं मार सकता। महात्म्य भीम! वायुदेव का स्मरण करो और इस मगधराज का वध करो।'
 
श्लोक 5:  उसके संकेत पर शत्रुओं का दमन करने वाले महाबली भीम ने बलवान जरासन्ध को उठाकर उसे शीघ्रतापूर्वक आकाश में घुमाना आरम्भ कर दिया॥5॥
 
श्लोक d4-d5h:  तब भगवान कृष्ण ने जरासंध को मारने की इच्छा से भीमसेन की ओर देखते हुए एक सरकंडा* हाथ में लिया और उसे (दंतखुरची की तरह) दो टुकड़ों में फाड़कर फेंक दिया। यह जरासंध को मारने का संकेत था।
 
श्लोक 6:  हे महाबली जनमेजय! भीम ने संकेत समझकर उसे सौ बार घुमाकर भूमि पर पटक दिया और उसकी पीठ को धनुष के समान मोड़कर अपने दोनों घुटनों के प्रहार से उसकी रीढ़ तोड़ दी। फिर भीम ने उसे अपने शरीर के घर्षण से कुचलते हुए बड़े जोर से गर्जना की।
 
श्लोक 7:  तत्पश्चात्, एक हाथ से उसका एक पैर पकड़कर तथा दूसरे पैर पर अपना पैर रखकर, महाबली भीम ने उसके दो टुकड़े कर दिए।
 
श्लोक d6-d8:  तब दोनों टुकड़े पुनः जुड़ गए और महाबली जरासंध भीम से युद्ध करने लगा। उन दोनों वीरों का वह युद्ध अत्यंत भयंकर एवं रोमांचकारी था। उसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो समस्त संसार नष्ट हो जाएगा। वह द्वंद्व समस्त जीवों में भय बढ़ा रहा था। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने पुनः एक सरकंडा लिया और पहले की भाँति उसके दो टुकड़े कर दिए और दोनों टुकड़ों को अलग-अलग विपरीत दिशाओं में फेंक दिया। यह जरासंध के वध का दूसरा संकेत था।
 
श्लोक d9:  भीमसेन को यह बात समझ में आ गई और उन्होंने मगधराज के दो टुकड़े कर दिए और दोनों टुकड़ों को पैरों से विपरीत दिशाओं में फेंक दिया। इसके बाद वे जोर से दहाड़ने लगे।
 
श्लोक d10-d11h:  महाराज! उस समय जरासंध का शरीर शव बन चुका था और मांस का लोथड़ा सा लग रहा था। उसका मांस, हड्डियाँ, चर्बी और त्वचा सब सूख चुके थे। उसका मस्तिष्क और शरीर दो टुकड़ों में फट गया था।
 
श्लोक 8-9:  जब जरासंध को रगड़ा जा रहा था और पाण्डुपुत्र गर्जना करके उसे पीस रहे थे, तब भीमसेन की गर्जना और जरासंध की चीख से उत्पन्न कोलाहलपूर्ण ध्वनि समस्त प्राणियों को भयभीत कर रही थी। उसे सुनकर मगध के सभी निवासी भय से काँप उठे। यहाँ तक कि स्त्रियाँ भी गर्भपात का शिकार हो गईं।
 
श्लोक 10:  भीमसेन की गर्जना सुनकर मगध के लोग भयभीत हो गये और सोचने लगे कि क्या हिमालय फट गया है या पृथ्वी फट गयी है।
 
श्लोक 11:  तत्पश्चात् वे तीनों शत्रुदमनकारी वीर रात्रि में ही राजा जरासन्ध के निर्जीव शरीर को राजद्वार पर इस प्रकार छोड़कर चले गए मानो वह सो रहा हो ॥11॥
 
श्लोक 12:  श्रीकृष्ण ने जरासंध के दिव्य रथ को ध्वजाओं और पताकाओं से सुसज्जित करके उसमें अपने दोनों भाइयों भीमसेन और अर्जुन को बैठाया और पर्वत की गुफा में जाकर वहाँ बन्दी बनाए गए अपने सभी सम्बन्धी राजाओं को छुड़ा लिया॥ 12॥
 
श्लोक 13:  उस महान भय से मुक्त होकर रत्नप्रेमी राजाओं ने भगवान श्रीकृष्ण से भेंट की और उन्हें नाना प्रकार के रत्नों से अलंकृत किया॥13॥
 
श्लोक 14:  भगवान श्रीकृष्ण अशरीरी और पूर्णतया शस्त्रों से सुसज्जित थे। उन्होंने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली थी। उस अवस्था में वे उस दिव्य रथ पर सवार होकर मुक्त राजाओं के साथ गिरिव्रज नगर से बाहर निकल आए॥14॥
 
श्लोक 15:  उस रथ का नाम सोदर्यावन था। उसमें दो महारथी एक साथ बैठकर युद्ध कर सकते थे। उस समय भगवान श्रीकृष्ण उसके सारथी थे। उस रथ में शत्रुओं पर बार-बार आक्रमण करने की क्षमता थी। वह रथ तेजस्वी होने के साथ-साथ समस्त राजाओं के लिए अजेय भी था॥ 15॥
 
श्लोक 16-17h:  भीम और अर्जुन - ये दोनों योद्धा उस रथ पर बैठे थे, श्रीकृष्ण सारथी का कार्य संभाल रहे थे, उन्हें परास्त करना श्रेष्ठ धनुर्धर योद्धाओं के लिए भी कठिन था। ये दोनों सारथी उस उत्तम रथ की ऐसी शोभा बढ़ा रहे थे मानो इन्द्र और विष्णु एक साथ बैठकर तारकीय संग्राम में विहार कर रहे हों॥16 1/2॥
 
श्लोक 17-18:  वह रथ तपे हुए सोने के समान चमकीला था। उसमें छोटी-छोटी घंटियों की झालरें लगी थीं। उसकी गड़गड़ाहट मेघ की गर्जना के समान थी। वह शत्रुओं का नाश करने वाला और विजय प्रदान करने वाला था। उस समय उस रथ पर सवार होकर श्रीकृष्ण उसमें भ्रमण कर रहे थे। 17-18।
 
श्लोक 19:  यह वही रथ था जिससे इन्द्र ने निन्यानवे राक्षसों का वध किया था। उस रथ को पाकर वे तीनों श्रेष्ठ पुरुष अत्यंत प्रसन्न हुए।
 
श्लोक 20:  तत्पश्चात् मगध के निवासी महाबाहु श्रीकृष्ण को अपने दो चचेरे भाइयों के साथ रथ पर बैठे देखकर आश्चर्यचकित हो गये।
 
श्लोक 21:  वह रथ वायु के समान वेगवान था और उसमें दिव्य घोड़े जुते हुए थे। भरत! श्रीकृष्ण के बैठने पर वह दिव्य रथ अत्यंत शोभायमान हो रहा था।
 
श्लोक 22:  उस उत्तम रथ पर देवताओं द्वारा निर्मित एक ध्वजा लहरा रही थी, जो रथ से अछूती थी (वह रथ से जुड़ी हुई नहीं थी, बिना किसी सहारे के रथ के ऊपर लहरा रही थी)। वह ध्वजा, बहुरंगी, सुन्दर, इन्द्रधनुष के समान चमकती हुई, एक योजन दूर से ही दिखाई दे रही थी।
 
श्लोक 23-24:  उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने गरुड़जी का स्मरण किया। गरुड़जी उसी क्षण वहाँ आ पहुँचे। उस रथ की ध्वजा में मुख खोले हुए बहुत से भूतगण भयंकर गर्जना करते रहे। उनके साथ सर्पभक्षी गरुड़जी भी उस महान रथ पर विराजमान हो गए। उनके कारण वह ध्वज उठे हुए चैत्यवृक्ष के समान शोभायमान हो गया। 23-24।
 
श्लोक 25-26:  अब वह उत्तम ध्वज अपनी चमक से ऐसे चमकने लगा जैसे सहस्रों किरणों से आच्छादित मध्याह्न का सूर्य चमक रहा हो। प्राणियों के लिए उसे देखना कठिन हो गया। वह कहीं वृक्षों में नहीं फँसता था, न ही शस्त्रों से कटता था। हे राजन! वह दिव्य और उत्तम ध्वज केवल इस लोक के लोगों को ही दिखाई देता था। 25-26।
 
श्लोक 27:  मेघ के समान गम्भीर गर्जना से भरे हुए उसी दिव्य रथ पर बैठकर भीमसेन और अर्जुन के साथ सिंहपुरुष भगवान श्रीकृष्ण नगर से बाहर निकले।
 
श्लोक 28:  हे राजा! वह रथ राजा वसु को इन्द्र से प्राप्त हुआ था। तब वसु ने इसे बृहद्रथ को दे दिया और बृहद्रथ ने इसे जरासंध को दे दिया।
 
श्लोक 29:  पराक्रमी, यशस्वी, कमल-नेत्र वाले, शक्तिशाली श्रीकृष्ण गिरिव्रज से बाहर आए और समतल भूमि पर खड़े हो गए।
 
श्लोक 30:  जनमेजय! वहाँ ब्राह्मणों सहित समस्त नागरिकों ने उनका आदर किया और शास्त्रों के अनुसार उनकी पूजा की।
 
श्लोक 31:  बन्दीगृह से छूटे हुए राजाओं ने भी मधुसूदन की पूजा की और उनकी स्तुति करते हुए इस प्रकार कहा ॥31॥
 
श्लोक 32:  महाबाहो! आप स्वयं भगवान हैं जो देवी देवकी को प्रसन्न करते हैं। आपके साथ भीमसेन और अर्जुन का बल है। आप जैसे धर्मावतार के लिए आपके द्वारा धर्म की रक्षा करना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
 
श्लोक 33:  हे प्रभु! हम सभी राजा जरासंध के उस भयंकर गर्त में डूब रहे थे, जो दुःख के कीचड़ से भरा हुआ था। आज आपने जिस प्रकार हमारी रक्षा की है, वह आपके योग्य है।
 
श्लोक 34:  'विष्णु! हम लोग एक अत्यन्त भयंकर पर्वतीय दुर्ग में बन्द होकर महान् दुःख में दिन बिता रहे थे। हे यदुवनंदन! आपने हमें इस संकट से मुक्त कर दिया है और अत्यन्त उज्ज्वल यश प्राप्त किया है; यह बड़े सौभाग्य की बात है॥ 34॥
 
श्लोक 35:  पुरुषसिंह! हम आपके चरणों में हैं। कृपया आज्ञा दीजिए, हम क्या सेवा करें? यदि कोई कठिन कार्य भी हो, तो आप उसे ऐसा समझें, मानो हम सब राजाओं ने मिलकर उसे पूरा कर लिया हो॥ 35॥
 
श्लोक 36:  तब महाहृदयी भगवान हृषिकेश ने सबको आश्वस्त करते हुए कहा, 'राजन्! धर्मराज युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करना चाहते हैं।
 
श्लोक 37:  धर्मपरायण होकर इसने सम्राट पद प्राप्त करने की इच्छा की है। आप सब लोग इस कार्य में इसकी सहायता करें॥37॥
 
श्लोक 38:  नृपश्रेष्ठ जनमेजय! तब वे सब राजा प्रसन्न हुए और ‘तथास्तु’ कहकर भगवान् की आज्ञा स्वीकार की॥38॥
 
श्लोक 39:  इतना ही नहीं, उन भूपालों ने भगवान दशरथ कुलभूषण को रत्न प्रदान किए। भगवान गोविन्द ने उन सब पर कृपा करने के लिए बड़ी कठिनाई से उस उपहार को स्वीकार किया॥39॥
 
श्लोक 40:  तत्पश्चात् जरासन्ध के पुत्र महामनस्वी सहदेव पुरोहित को आगे करके अपने सेवकों और मन्त्रियों के साथ नगर से बाहर चले गये।
 
श्लोक 41:  उसके आगे बहुमूल्य रत्नों का विशाल भण्डार था। सहदेव ने नम्रतापूर्वक मनुष्यों के स्वामी भगवान वासुदेव के चरणों में गिरकर उनकी शरण ली। 41।
 
श्लोक d12:  सहदेव बोले- मानसिंह जनार्दन! महाबाहु पुरुषोत्तम! कृपया मेरे पिता द्वारा किये गये अपराध को अपने हृदय से दूर कर दीजिये।
 
श्लोक d13:  गोविन्द! मैं आपकी शरण में आया हूँ। प्रभु! मुझ पर दया कीजिए। देवकीनन्दन! मैं अपने पिता का अंतिम संस्कार करना चाहता हूँ।
 
श्लोक d14:  मैं आपसे, भीमसेन और अर्जुन से अनुमति लेकर यह कार्य करूंगा और आपकी कृपा से अपनी इच्छानुसार निर्भयतापूर्वक और सुखपूर्वक विचरण करूंगा।
 
श्लोक d15:  वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! सहदेव के इस अनुरोध पर देवकीनन्दन भगवान श्रीकृष्ण तथा महारथी भीमसेन तथा अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए।
 
श्लोक d16-d18:  वे सब एक स्वर में बोले- 'राजन! आप अपने पिता का अन्तिम संस्कार कीजिए।' भगवान श्रीकृष्ण और दोनों कुन्तीकुमारों का यह आदेश सुनकर मगधराज अपने मंत्रियों के साथ शीघ्रतापूर्वक नगर में प्रविष्ट हुए। फिर चन्दन और केसर, देवदारु और काली अगरु आदि सुगन्धित काष्ठों से एक चिता बनाकर उस पर मगधराज का शव रखा गया। तत्पश्चात, जब चिता जल रही थी, तब मगधराज के शरीर पर चन्दन और घी आदि नाना प्रकार के सुगन्धित तेलों की धाराएँ गिराई गईं। चारों ओर से अक्षत और पुष्पों की वर्षा की गई।
 
श्लोक d19-d20:  दाह संस्कार के बाद, सहदेव ने अपने छोटे भाई के साथ अपने पिता को जल अर्पित किया। इस प्रकार, अपने पिता का आध्यात्मिक कार्य संपन्न करके, राजकुमार सहदेव नगर छोड़कर उस स्थान पर गए जहाँ भगवान कृष्ण और पांडु पुत्र भीमसेन और अर्जुन उपस्थित थे। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान कृष्ण से विनम्रतापूर्वक कहा, "हे भगवान!
 
श्लोक d21-d22h:  सहदेव बोले—प्रभो! ये गायें, भैंसें, भेड़-बकरियाँ, अनेक रत्न, हाथी-घोड़े और नाना प्रकार के वस्त्र आपको भेंट हैं। गोविन्द! ये सब वस्तुएँ आप धर्मराज युधिष्ठिर को दे दीजिए अथवा मुझे आपकी इच्छानुसार सेवा करने का आदेश दीजिए।
 
श्लोक 42:  वह भय से पीड़ित था; भगवान श्रीकृष्ण ने उसे सुरक्षा प्रदान की और उसके द्वारा लाए गए बहुमूल्य रत्नों का दान स्वीकार किया।
 
श्लोक 43:  तत्पश्चात् जरासन्धकुमार प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता के राज्य में अभिषिक्त हुआ। श्रीकृष्ण ने सहदेव को अपना घनिष्ठ मित्र बना लिया, अतः भीमसेन और अर्जुन ने भी उसका बहुत आदर-सत्कार किया। 43॥
 
श्लोक 44:  राजन! उन महात्माओं से अभिषिक्त होकर महाबाहु जरासन्धपुत्र राजा सहदेव अपने पिता की नगरी में लौट आये ॥44॥
 
श्लोक 45:  और उत्तम सुन्दरता से विभूषित पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण प्रचुर रत्नों का दान लेकर दोनों कुन्तीकुमारों के साथ वहाँ से चले गए॥45॥
 
श्लोक 46:  भीमसेन और अर्जुन के साथ इन्द्रप्रस्थ में आकर भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर से मिले और बड़े प्रसन्न होकर बोले- 46॥
 
श्लोक 47:  हे राजनश्रेष्ठ! यह सौभाग्य की बात है कि महाबली भीमसेन ने जरासंध को मारकर उसकी कैद से सभी राजाओं को मुक्त करा लिया।
 
श्लोक 48:  'भरत! सौभाग्य से भीमसेन और अर्जुन दोनों भाई सकुशल अपने नगर में लौट आये और उन्हें कोई हानि नहीं हुई॥ 48॥
 
श्लोक 49:  तब युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण का आदर-सत्कार कर भीमसेन और अर्जुन को भी प्रसन्नतापूर्वक गले लगा लिया। 49॥
 
श्लोक 50:  तत्पश्चात् जरासंध के विनाश और उसके दोनों भाइयों की विजय के पश्चात, राजा युधिष्ठिर, जिनका कोई शत्रु नहीं था, अपने भाइयों सहित अत्यन्त प्रसन्न हुए।
 
श्लोक d23:  तब धर्मराज ने हर्ष से भरकर भगवान श्रीकृष्ण से कहा।
 
श्लोक d24:  युधिष्ठिर ने कहा, 'मानसिंह जनार्दन! आपकी ही सहायता से भीमसेन ने बल के अभिमान में मदमस्त महाबली मगधराज जरासंध का वध किया।
 
श्लोक d25:  अब मैं चिंता मुक्त हो जाऊँगा और सभी यज्ञों में श्रेष्ठ राजसूय यज्ञ का शुभ अवसर प्राप्त करूँगा। हे प्रभु! आपकी बुद्धि और शक्ति के सहयोग से मैं इस यज्ञ को करने के योग्य हो गया हूँ।
 
श्लोक d26:  पुरुषोत्तम! इस युद्ध से आपकी कीर्ति संसार भर में फैल गई है। जरासंध को मारकर ही आपको अपार धन प्राप्त हुआ है।
 
श्लोक d27-d28:  वैशम्पायन कहते हैं- जनमेजय! ऐसा कहकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने भगवान को एक महान रथ भेंट किया। जरासंध से वह रथ पाकर गोविन्द अत्यन्त प्रसन्न हुए और अर्जुन के साथ उसमें बैठकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। धर्मराज युधिष्ठिर से वह उपहार स्वीकार करके वे अत्यन्त संतुष्ट हुए।
 
श्लोक 51:  पाण्डवपुत्र युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ गए और आयु के अनुसार एक-एक करके सभी राजाओं से मिले; फिर उनका यथोचित आदर और पूजन करके उन्हें विदा किया ॥51॥
 
श्लोक 52:  राजा युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर वे सब राजा मन में अत्यन्त प्रसन्न होकर नाना प्रकार के वाहनों द्वारा शीघ्र ही अपने-अपने देशों को चले गये।
 
श्लोक 53:  जनमेजय! इस प्रकार परम बुद्धिमान जनार्दन ने उस समय पाण्डवों द्वारा अपने शत्रु जरासन्ध को मरवा डाला ॥53॥
 
श्लोक 54-56:  भरत! शत्रुओं का नाश करने वाले श्रीकृष्ण बुद्धि से जरासंध का वध करके धर्मराज युधिष्ठिर, कुन्ती और द्रौपदी से अनुमति लेकर, सुभद्रा, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव और धौम्यजी से भी पूछकर, धर्मराज द्वारा दिये हुए उसी दिव्य और उत्तम रथ पर, जो मन के समान वेगवान था, समस्त दिशाओं में विचरण करते हुए अपनी द्वारका नगरी को चले गये।
 
श्लोक 57:  हे भरतश्रेष्ठ! जाते समय युधिष्ठिर आदि सभी पाण्डवों ने सहज ही सब कार्य करने वाले भगवान श्रीकृष्ण की परिक्रमा की॥57॥
 
श्लोक 58-59:  भारत! महान विजय प्राप्त करके और जरासन्ध द्वारा बन्दी बनाए गए राजाओं को संरक्षण देकर जब देवकीपुत्र भगवान श्रीकृष्ण चले गए, तब उपर्युक्त कर्मों के कारण पाण्डवों की कीर्ति बहुत बढ़ गई और वे पाण्डव भी द्रौपदी के प्रति प्रेम बढ़ाने लगे॥58-59॥
 
श्लोक 60:  उस समय राजा युधिष्ठिर धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि के लिए धर्मपूर्वक धर्म का पालन करते हुए अपनी प्रजा की रक्षा करते हुए उन्हें धर्म का उपदेश भी देते रहे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)