श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 22: जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन  »  श्लोक d36
 
 
श्लोक  2.22.d36 
उग्रसेनं च वृष्णींश्च महाबलसमन्वित:।
स तत्र विप्रकुरुते जरासंध: प्रतापवान्॥
एतद् वैरं कौरवेय जरासंधस्य माधवे।
 
 
अनुवाद
जनमेजय! प्रतापी जरासंध महान बल और सैन्यबल से संपन्न था। वह उग्रसेन और वृष्णिवंश को सदैव कष्ट पहुँचाता रहता था। कुरुनन्दन! यह जरासंध और श्रीकृष्ण के बीच शत्रुता की कथा है।
 
Janamejaya! The glorious Jarasandha was endowed with great strength and military power. He always used to cause trouble to Ugrasen and Vrishnivansh. Kurunandan! This is the story of the enmity between Jarasandha and Shri Krishna.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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