श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 22: जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन  »  श्लोक d29
 
 
श्लोक  2.22.d29 
वासुदेवोऽपि गोपेषु ववृधेऽब्जमिवाम्भसि।
अज्ञायमान: कंसेन गूढोऽग्निरिव दारुषु॥
 
 
अनुवाद
वसुदेव भी जल में कमल की तरह ग्वालों के बीच रहकर बड़े हुए। लकड़ी में छिपी अग्नि की तरह वे भी वहाँ गुमनाम रहने लगे। कंस उन्हें ढूँढ़ नहीं पाया।
 
Vasudev also grew up living among the cowherds like a lotus in water. Like fire hidden in wood, he started living there anonymously. Kansa could not find him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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