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mahabharat 2.22.6: मैं अपने मन को वश में रखता हूँ और सदैव अपने स्वधर्म (क्षत्रिय धर्म) में दृढ़ रहता हूँ। मैं अपनी प्रजा के प्रति कोई अपराध नहीं करता, किन्तु ऐसी अवस्था में भी तुम लोग प्रमादवश मुझे शत्रु या अपराधी कह रहे हो॥6॥   |   mahabharat अध्याय 2.22: जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 22: जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.22.6 
तस्य मेऽद्य स्थितस्येह स्वधर्मे नियतात्मन:।
अनागसं प्रजानां च प्रमादादिव जल्पथ॥ ६॥
 
 
अनुवाद
मैं अपने मन को वश में रखता हूँ और सदैव अपने स्वधर्म (क्षत्रिय धर्म) में दृढ़ रहता हूँ। मैं अपनी प्रजा के प्रति कोई अपराध नहीं करता, किन्तु ऐसी अवस्था में भी तुम लोग प्रमादवश मुझे शत्रु या अपराधी कह रहे हो॥6॥
 
I keep my mind under control and always remain steadfast in my own Dharma (Kshatriya Dharma). I do not commit any crime against my subjects, but even in such a condition you people are calling me an enemy or a criminal due to negligence. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)