श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 22: जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.22.5 
त्रैलोक्ये क्षत्रधर्मो हि श्रेयान् वै साधुचारिणाम्।
नान्यं धर्मं प्रशंसन्ति ये च धर्मविदो जना:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
अच्छे कर्म करने वाले क्षत्रियों के लिए क्षत्रिय धर्म तीनों लोकों में श्रेष्ठ है। धार्मिक पुरुष क्षत्रियों के लिए अन्य धर्मों की प्रशंसा नहीं करते। 5॥
 
For the Kshatriyas who do good deeds, Kshatriya religion is the best among the three worlds. Religious men do not praise other religions for Kshatriyas. 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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