श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 22: जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.22.29 
देवतार्थमुपाहृत्य राज्ञ: कृष्ण कथं भयात्।
अहमद्य विमुच्येयं क्षात्रं व्रतमनुस्मरन्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! क्षत्रिय व्रत को सदैव स्मरण रखने वाला मैं आपके भय से देवताओं को बलि देने के लिए लाए गए इन राजाओं को कैसे छोड़ सकता हूँ?॥ 29॥
 
Shri Krishna! Always remembering the vow of a Kshatriya, how can I, out of fear of you, let go of these kings who have been brought as gifts for sacrificing to the gods?॥ 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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