श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 22: जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.22.28 
क्षत्रियस्यैतदेवाहुर्धर्म्यं कृष्णोपजीवनम्।
विक्रम्य वशमानीय कामतो यत् समाचरेत्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! क्षत्रिय के लिए यही धर्म बताया गया है कि वह वीरतापूर्वक अपने शत्रु को वश में करे और फिर उसके साथ अपनी इच्छानुसार व्यवहार करे॥ 28॥
 
Shri Krishna! For a Kshatriya it has been prescribed as a dharma (righteous way of life) that he should subdue his enemy by displaying valour and then treat him as he pleases.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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