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श्लोक 2.22.27  |
जरासंध उवाच
नाजितान् वै नरपतीनहमादद्मि कांश्चन।
अजित: पर्यवस्थाता कोऽत्र यो न मया जित:॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| जरासन्ध ने कहा—श्रीकृष्ण! मैं युद्ध में परास्त हुए बिना किसी राजा को बंदी बनाकर यहाँ नहीं लाता। क्या यहाँ कोई ऐसा शत्रु राजा है जो दूसरों से अजेय होते हुए भी मुझसे जीता न गया हो?॥27॥ |
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| Jarasandha said— Shri Krishna! I do not bring any kings as captives here without defeating them in battle. Is there any enemy king here who has not been conquered by me despite being invincible to others?॥ 27॥ |
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