श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 22: जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.22.15 
नास्ति लोके पुमानन्य: क्षत्रियेष्विति चैव तत्।
मन्यसे स च ते राजन् सुमहान् बुद्धिविप्लव:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! तुमने ऐसा मान लिया है कि इस संसार के क्षत्रियों में मेरे समान कोई नहीं है, यह तुम्हारी बुद्धि का महान भ्रम है॥15॥
 
O King! You have assumed that there is no one like me amongst the Kshatriyas of this world, this is a great delusion of your intellect. ॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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