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mahabharat 2.21.d1-d2: श्वेत वृषभ, विपुल, वराह, श्रेष्ठ चैत्यक और मतंग गिरि - इन सभी महान पर्वतों पर सभी सिद्धों के विशाल भवन हैं और तपस्वियों, ऋषियों और महात्माओं के अनेक आश्रम हैं।   |   mahabharat अध्याय 2.21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  2.21.d1-d2 
(पाण्डरे विपुले चैव तथा वाराहकेऽपि च।
चैत्यके च गिरिश्रेष्ठे मातङ्गे च शिलोच्चये॥
एतेषु पर्वतेन्द्रेषु सर्वसिद्धमहालया:।
यतीनामाश्रमाच्चैव मुनीनां च महात्मनाम्॥
 
 
अनुवाद
श्वेत वृषभ, विपुल, वराह, श्रेष्ठ चैत्यक और मतंग गिरि - इन सभी महान पर्वतों पर सभी सिद्धों के विशाल भवन हैं और तपस्वियों, ऋषियों और महात्माओं के अनेक आश्रम हैं।
 
The white Vrishabha, Vipul, Varaha, the best Chaityaka and Matang Giri - on all these great mountains there are huge buildings of all the Siddhas and there are many ashrams of ascetics, sages and Mahatmas.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)