श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.21.8 
वनराजीस्तु पश्येमा: पिप्पलानां मनोरमा:।
लोध्राणां च शुभा: पार्थ गौतमौक: समीपजा:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
पार्थ! गौतम के आश्रम के पास पीपल और लोधों के वृक्षों की सुन्दर एवं मनोरम पंक्तियां देखिये।
 
Parth! Look at the beautiful and picturesque forest rows of Peepal and Lodhon trees growing near Gautama's hermitage. 8.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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