श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़-फोड़कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.21.6 
गौतम: प्रणयात् तस्माद् यथासौ तत्र सद्मनि।
भजते मागधं वंशं स नृपाणामनुग्रहात्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
इस कारण गौतम ऋषि राजाओं के प्रति प्रेमवश वहाँ आश्रम में रहते हैं और मगध के राजवंश की सेवा करते हैं ॥6॥
 
For this reason the sage Gautama lives in the hermitage there out of love for the kings and serves the royal dynasty of Magadha. ॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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